बिखरती मुन्नी को जीविका ने संभाला.बन गयी आत्मनिर्भर.
HighLights
गुठनी.अत्यंत गरीब व बेसहारा महिलाओं के लिये बिहार सरकार का जीविका परियोजना काफी हमदर्द साबित हो रहा है और उनलोगों की मदद कर आत्मनिर्भर बनाने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है.शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार सरकार द्वारा देशी शराब व ताड़ी के उत्पादन एवं विक्री में पारंपरिक रूप से जुड़े अत्यंत निर्धन परिवार तथा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लक्षित अत्यंत निर्धन परिवारों को सहायता एवं सामाजिक आर्थिक शशक्तिकरण हेतु माननीय मुख्यमंत्री ने जीविका के माध्ययम से सतत जीविकोपार्जन योजना की शुरुवात की थी.इस योजना के तहत गुठनी प्रखंड क्षेत्र में अनेकों महिलाओं को इसका लाभ मिला है और अत्यंत गरीब व लाचार असहाय महिलाये आत्मनिर्भर बन गयी है.ऐसी ही एक महिला गुठनी के बिहारी गांव की बेटी व गोपालगंज के मीरगंज थाना क्षेत्र के बरईपट्टी गांव की बहू मुन्नी खातून.बिहारी गांव की बिटियां मुन्नी की शादी 2002 में बरईपट्टी के मुख्तार अंसारी के संग हुई थी.मुख्तार पहले गांव ही रहते थे फिर मुंबई में नौकरी करने लगे थे और 2010 में वे विदेशी धरती मलेशिया नौकरी के लिये चले गये.मलेशिया में अभी छः माह भी पूरे नही हुये थे कि उनके मौत की खबर आ गयी.और यही से शुरू हुआ मुन्नी का दुर्दिन.कुछ दिनों तक मुन्नी की आंखे पति के शव की प्रतीक्षा करती रही लेकिन शव भी नही आया और ना ही मिला कुछ सहयोग.पति की मौत के बाद ससुराल में खाने खाने को मोहताज हुयी मुन्नी अपने दो मासूम बच्चों के साथ अपने मायके बिहारी गांव आ गयी.मायके में कुछ दिन सहारा मिला लेकिन वह दिन लंबा नही चल सका और मुन्नी तेनुआ मोड़ पर दुकाननुमा एक कमरे में अपने बच्चों संग रहने लगी चुकी मकान मालिक पहचान वाले लोग थे जिनके सहयोग से खाने पीने की व्यवस्था हो गयी.पिछले वर्ष जीविका दीदियों द्वारा सतत जीविकोपार्जन योजना के लाभार्थीयो के चयन के लिये सर्वे किया जा रहा था उसी क्रम में दीदियों की नजर मुन्नी पर पड़ी और उसकी विवशता को देखा.जीविका परियोजना द्वारा मुन्नी खातून को जीविका के उज्ज्वल ग्राम संगठन के विश्वकर्मा स्वयं सहायता समूह से जोड़कर सतत जीविकोपार्जन योजना के लिए चयनित किया गया.मुन्नी ने श्रृंगार प्रसाधन के दुकान करने की सहमति दी जिसपर परियोजना ने अमल करते हुये स्वीकृति प्रदान कर दी.मुन्नी ने अपने और बच्चों के पालन पोषण के लिये कठिन परिस्थितियों को झेलते हुये दैनिक मजदूरी (आसपास के घरों में) में किया करती थी बावजूद बच्चों के लिये कुछ बेहतर नही कर पाती थी.ऐसी स्थिति जब जीविका दीदियों ने उसे योजना के बारे में समझायी तो मानो उसके सपने साकार होते दिखने लगे और वह श्रृंगार प्रसाधन की दुकान उसी कमरे में कर ली जिसमे वह रहती थी.हौशला को बुलंद रखते हुये मुन्नी ने जीविका के एसजेवाई से प्रदत सहयोग की बदौलत एक साल में ही अपनी परिस्थिति को बदल डाली.जीविका से जुड़ने के बाद मुन्नी खातून मुन्नी दीदी बन कर दुकान चलाने लगी और दुकान को बढ़ाते हुये पूंजी तो दुगुना कर ही ली साथ मे पार्लर का भी काम करने लगी है.जो मुन्नी कल तक 100 रुपये की मोहताज थी आज 10 हजार मासिक की आय बना ली है कल तक बच्चों के शिक्षा के लिये चिंतित थी आज बेटे का नामांकन निजी स्कूल में करा दी है तो बड़ी बेटी मुस्कान दसवीं कक्षा में पढ़ रही है.मुन्नी ने बताया मैंने काफी परेशानियों का सामना किया बहुत लोगों की अनावश्यक बातों का सामना करना पड़ा परंतु बच्चों के फ्यूचर को देखकर अपने को संभालती रही और धैर्य नहीं खोया.अंत मे जीविका ने मुझे संभाल लिया और अब मैं आत्मनिर्भर बनने लगी हूं हालांकि समस्या अब भी बरकरार है.अब भी रहने के लिये अपना घर करना है लेकिन उसके पहले बेटी बेटा को शिक्षा देकर उन्हें मुकाम तक पहुचाना में लक्ष्य है.
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